मंगलवार, 6 अगस्त 2013

शिक्षा-प्रणाली-एक मूल गूढ समस्या

इस लेख की शुरुआत करने से पूर्व मैं क्षमा प्रार्थी हूँ । क्योंकि विषय-वस्तु मस्तिष्क मे होने के पश्चात भी मैं उपयुक्त शीर्षक न खोज सका । खैर , मुद्दे पर वापस लौटते हैं । यह लेख आज के समाज मे फैली हर समस्या का मूल खोजने के संदर्भ मे है । सर्वप्रथम समस्या क्या है वो समझना आवश्यक है । प्रत्येक काल, देश, स्थान व समाज की अलग-अलग समस्याएँ हो सकती हैं । विभिन्न विचारधाराओं के टकराव से समस्याओं का जन्म होता है । हालांकि यह कारण हो सकता है सम्पूर्ण न हो , परंतु एक प्रधान कारण तो है ही । आइये जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को इस कसौटी पर कसते हैं । सर्वप्रथम संप्रदाए का क्षेत्र देखते हैं । विभिन्न संप्रदाए हमारे आस-पास के समाज में है । संप्रदायों के टकराव से कुछ तात्कालिक एवं कुछ दीर्घकालिक समस्याएँ उत्पन्न हुयी हैं । तात्कालिक समस्या आतंकवाद को कहा जा सकता है क्योंकि संप्रदाए को ही माध्यम बनाकर ये फैलाया जाता है । दीर्घकालिक समस्या अगर नारी की वर्तमान दशा को कहा जाये, तो गलत न होगा । हमारे समाज में जहां कभी "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते" की स्थिति थी, वहाँ आज नारी भोग-वस्तु बन गयी है । आर्थिक क्षेत्र को लें, तो उसमे भी दो टकराव वाली विचारधाराएँ , पूंजीवाद व साम्यवाद हैं । दोनों को ही आधार बनाकर कई समस्याओं ने जन्म लिया है , यह सर्वविदित है । सामाजिक क्षेत्र पर दृष्टि डाली जाए तो यहाँ पर भी भारतीय व पश्चिमी जीवन शैली के टकराव के कारण समस्याएँ उत्पन्न हुयी हैं । परंतु विचारणीय तथ्य यह है कि इन सब का मूल आधार क्या है ?

मेरे अब तक के विश्लेषण से मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि "शिक्षा" ही इसका आधार है । शिक्षा की दिशा गलत होने के कारण ही हम वर्तमान कि अनेक समस्याओं मे उलझे हैं । हमारी शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य ऐसे ही योग्य मनुष्य तैयार करना है जो समाज को चतुर्मुख उन्नत बना सकें । ये तो रहा उद्देश्य , पर क्या हमने उद्देश्य पाने के लिए दिशा उचित चुनी ?

आजकल कि इस भोगवादी व्यवस्था का कारण शिक्षा की गलत दिशा को कहना अतिशयोक्ति न होगी । आजकल हम आर्थिक, सामाजिक, व्यक्तिगत हर दिशा से संकुचित होते जा रहे हैं , परिवार संकुचित होते जा रहे हैं । मनुष्य आत्मकेंद्रित होता जा रहा है । अपना सुख , अपनी संतुष्टि ही सर्वोपरि है । इस क्षणिक तथा अल्प लाभ के भुलावे में हम दीर्घकालिक समस्याएँ पैदा करते जा रहे हैं । मजे कि बात तो यह है कि सामान्य स्तर पर या तो हम समझ नहीं पा रहे हैं अथवा या तो समझना नहीं चाहते हैं । इस नासमझी का कारण क्या है ?, इसे समझना आवश्यक है अन्यथा निवारण संभव न हो सकेगा । हमारी शिक्षा हमें कर्तव्यपरायणता कि ओर न ले जाकर क्षणिक भोग कि तरफ ले जाती है । चूंकि शिक्षागत दोष के कारण हम कर्तव्यपरायणता से होने वाले दीर्घकालिक लाभों को समझ नहीं पाते हैं । हम समझते हैं कि इस गुण से हमारा व्यक्तिगत लाभ होने की संभावना कम है । यही हमारी शिक्षा की दिशा गलत सिद्ध हो जाती है क्योंकि यह इन गुणो से होने वाले व्यक्तिगत लाभों को समझा सकने में असमर्थ है । अगर हम ध्यान से विश्लेषण करें तो पाएंगे कि यदि इस समाज में कर्तव्यपरायण नागरिक हो, तो हमारी अधिकतर समस्याएँ यूं ही समाप्त हो जाएंगी । क्योंकि कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति अपनी कर्तव्यों पर केन्द्रित होगा । वह वस्तुओं का उतना ही उपभोग करेगा जितनी आवश्यक हैं, अर्थात वह व्यक्ति स्वनियंत्रित होगा। आज हम ऐसे लोगों को यांत्रिक कहेंगे। हम ऐसा सोच भी नहीं सकते हैं,क्यों? क्योंकि बचपन से ही हमें इस मैकालेवादी शिक्षा पद्धति ने हमे इसी तरह से प्रशिक्षित किया है। यही तो मूलबिंदु है। एक मैकाले ने जितना हमारा विनाश किया उतना कि सी अंग्रेज़ ने नहीं किया। इस विश्लेषण से हमे यह पता चलता है कि शिक्षा कि  गलत दिशा कितना उथल-पुथल ला सकती है। हम यह भी जानते हैं कि यदि हम इसे सही तरीके से उपयोग मे लायेँ तो जितना इसके द्वारा विनाश हुआ है , उतना ही विकास भी संभव है। परंतु अगर हम पश्चिम कि तरफ भी देखें तो पाएंगे कि गलत दिशा के कारण ही उनका भी उतना ही विनाश हो रहा है। परिवार व्यवस्था तकरीबन नष्ट होने की ओर है। परिवार के आरोही क्रम मे स्थित होने कारण समाज भी विखंडित हो रहे हैं। आधुनिकतम चिकित्सीय सुविधाएं होने के बावजूद वे दुसाध्य रोगों से ग्रश्त हैं तथा असाध्य रोगों के जनक बन रहे हैं जैसे कि एड्स। मानसिक रोग आम पाये जाते हैं। भौतिक सारी सुख सुविधाएं उप्लब्ध होने के बाद भी वे विनाशात्मक प्रवृति के धारक बन गए हैं। वे तभी तक तक विकासवादी रहते हैं, जब तक उनके अनियंत्रित भोग मे कोई विघ्न न उत्पन्न हो। जैसा ही ऐसा कुछ होता है, तो संसार विश्वयुद्ध व शीतयुद्ध मे जलाने लगता है। ये केवल शिक्षा प्रणाली से उत्पन्न प्रकृति के कारणवश है। अगर अब भी अविश्वास शेष हो तो आइये एक और समस्या पर निगाह डालते हैं। वर्तमान विश्व पर छाया सबसे बड़ा संकट जलवायु परिवर्तन का है,परंतु कोई भी देश कार्बन उत्सर्जन की अपेक्षित मात्र की कटौती नहीं करना चाहता है क्योंकि इससे विभिन्न राजनैतिक,आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न हो जाएंगी। यह बात सत्य है। पर यह परिस्थिति उत्पन्न केवल अनियंत्रित प्रकृतिक दोहन के कारण उत्पन्न हुई। केदारनाथ ज्वलंत उदाहरण है कि इस अनियंत्रित भोग ने हमें किस ओर धकेल दिया है। अनियंत्रित भोग की प्रकृति  केवल शिक्षा की गलत दिशा के कारण उत्पन्न हुई है। मैं अपेक्षा करता हूँ कि भविष्य में इस समस्या का भी कोई न कोई समाधान निकाल लिया जाएगा। परंतु समस्या पैदा करने की जरूरत ही क्या है? आँखों देखी मक्खी कोई  निगलता है भला? बचाव हमेशा उपचार से अच्छा होता है,ये सर्वविदित तथा सर्वमान्य सत्य है। फिर भी लोग इस सत्य से इस प्रकार मुँह फेर बैठे हैं जैसे कोई धूम्रपान करने वाला व्यक्ति जानता है कि वो मृत्युगामी हो रहा है, परंतु आदत छोडने को तैयार नहीं होता है? यही भोग का परिणाम होता है । आप कहेंगे कैसे शिक्षा प्रणाली भोगवादी है ?

आज हमारी ही सरकार का लक्ष्य पचास करोड़ तकनीकी रूप से कुशल कामगार पैदा करना है, न कि कुशल नागरिक । आज कि अर्थ-व्यवस्था पूरी तरह उपभोग पर निर्भर है । क्योंकि जितना अधिक उपभोग, उतना अधिक लाभ । अधिक उपभोग हमेशा अनियंत्रित भोग कि ओर मुख करके बैठा है । पर आप यह कह सकते है कि अर्थ-व्यवस्था का इसी प्रकार का ढांचा ज्यादा रोजगार सृजन कर सकता है । परंतु अधिक रोजगार हमे अधिक जनसंख्या के कारण चाहिए । अधिक जनसंख्या का भी एक कारण अनियंत्रित शारीरिक भोग ही है । जबकि हमारी प्राचीन संस्कृति के अनुसार संतानोत्पत्ति के लिए ही शारीरिक संबंध बनाए जाने चाहिए । यहीं पर शिक्षा कि दोनों पद्धतियों का अंतर सुस्पष्ट होता है । आज कि इस पीढ़ी के लिए उपरोक्त बात असंभव सी प्रतीत होगी । क्योंकि हमें उचित प्रशिक्षण इस दिशा में नहीं मिला है, अन्यथा बलात्कार जैसी समस्या इतनी विकराल न हुई होती। उपर्युक्त सारे उदाहरण एवं कारण शिक्षा प्रणाली की दिशा की कमियों को उजागर करते हैं। ऐसा नही कि वर्तमान शिक्षा पद्धति से हमे सकारात्मक कुछ प्राप्त ही नहीं हुआ, इसीलिए मैं शिक्षा कि दिशा की बात कर रहा हूँ। अगर मैकाले हमारी शिक्षा-प्रणाली को धीरे-धीरे ही सही पूर्णतया दूषित कर सकता है, तो उसे धीरे-धीरे उसे सुधारा भी जा सकता है। यह हमारी पुरातन शिक्षा पद्धति है जो हमें सिखाती है कि सब कुछ परिवर्तनशील है, तो ये परिवर्तन भी संभव है। समय लगेगा, परंतु प्रयास तो करना ही पड़ेगा, अन्यथा हम सदैव स्वजनित समस्याओं से ग्रस्त रहेंगे। ये तो रहे मेरे विचार, बाकी आप लोगों के विचार अपेक्षित हैं। आप लोग अवश्य प्रतरिकया दें ताकि मैं अपनी सोच को नयी दिशा एवं नया स्तर दे सकूँ। 
                                  
                                                                                                                                   धन्यवाद!